संकट के बरक्स

इस समय जब कोरोना संक्रमण का चक्र तोड़ने की मंशा से पूरे देश में पूर्ण बंदी है और सरकारें लोगों को रोजमर्रा की हर चीज उपलब्ध कराने की अपनी वचनबद्धता दोहरा रही हैं, राशन आदि को लेकर अव्यवस्था का आलम बना हुआ है। राशन की दुकानों, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के केंद्रों आदि पर लोगों को असुविधा न हो, इसलिए सरकारों ने लोगों को अतिरिक्त राशन सामग्री उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं। हर जगह वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के हर संभव प्रयास हो रहे हैं। लोगों को घर बैठे वस्तुएं उपलब्ध हो सकें, इसलिए आनलाइन खरीदारी और राशन वितरण की सुविधा को कारगर बनाने पर जोर है। मगर हालत यह है कि राशन की दुकानों पर घंटों लंबी कतारें लगी देखी जा रही हैं, जिससे सामाजिक दूरी का निर्वाह न हो पाने के कारण कोरोना संक्रमण के चक्र को तोड़ने का संकल्प धुंधला नजर आ रहा है। इसी तरह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत पंजीकरण कराने के लिए साइबर कैफे के सामने लंबी कतारें देखी जा रही हैं। पंजीकरण के लिए मनमाने शुल्क वसूले जा रहे हैं, सो अलग समस्या है, पंजीकृत लोगों को भी राशन नहीं पहुंच पा रहा। इससे लोगों में नाहक अफरा-तफरी मची हुई है। यह स्थिति दिल्ली की है, जहां अधिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। फिर दूर-दराज के गांवों-कस्बों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस अव्यवस्था के पीछे एक बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि पूर्ण बंदी की घोषणा करने से पहले सरकारों को रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए समुचित तैयारी का वक्त नहीं मिला। फिर लोगों में यह आशंका व्याप्त हो गई कि न जाने यह बंदी कितने दिन खिंचेगी। इसलिए लोग जरूरत से कहीं अधिक राशन जुटाने में जुट गए। हालांकि सरकारों ने दावा किया कि राशन की दुकानों पर भरपूर राशन उपलब्ध है और इसके लिए घबराने की जरूरत नहीं है, पर हकीकत यह है कि लोगों को राशन उपलब्ध नहीं हो पा रहा। दिल्ली सरकार ने लोगों को मुफ्त राशन वितरण का अभियान भी चला रखा है, फिर भी राशन की दुकानों के आगे भीड़ कम नहीं हो रही। आनलाइन खरीददारी का आलम यह है कि लोग आदेश दे रहे हैं, पर सामान उन तक नहीं पहुंच पा रहा। इससे सरकारी दावों और प्रयासों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। रोजमर्रा की वस्तुओं की समुचित उपलब्धता न हो पाने के पीछे एक कारण तो यह हो सकता है कि बंदी की वजह से शुरुआती दिनों में माल ढुलाई करने वाले वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित हुई थी। फिर आवागमन के सार्वजनिक वाहन बंद होने और लोगों को पास वगैरह उपलब्ध न हो पाने के कारण दुकानों पर कर्मचारियों की कमी है। इस वजह से जहां कई लोग काम करते थे, वहां एक-दो लोगों को सारे काम निपटाने पड़ रहे हैं। फिर दुकानें भी कम खुल रही हैं। बहुत सारे शॉपिंग मॉल और मुहल्लों की दुकानें नहीं खुल पा रहीं। तिस पर वस्तुओं की मांग बढ़ी है। इसलिए भी राशन और रोजमर्रा की दूसरी वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो रही है। पर अब बंदी के दस दिन हो रहे हैं, इतने दिनों में भी सरकारें जरूरी सामान की अपूर्ति सुनिश्चित नहीं कर पा रही हैं, तो उनकी तैयारियों पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। दुकानदारों के वस्तुओं की मनमानी कीमतें वसूलने की प्रवृत्ति पर सख्ती से अंकुश लगाने के अलावा वस्तुओं की समुचित आपूर्ति कराने के लिए सरकारों को नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।